Monday, 8 March 2021

 

अब देखिए धारावाहिक अनंतकोटि ब्रह्मांड नायक साईबाबा

     तिरुपति फिल्म्स के बैनर तले बन रहे दैनिक धारावाहिक, अनंतकोटि ब्रह्मांड नायक साईबाबा के निर्माता विकास कपूर है और निर्देशक चंद्रसेन सिंह व विजय सैनी है। जिसका प्रसारण 16 फरवरी २०२१ से प्रत्येक सोमवार से शुक्रवार रात 8.30 बजे 'डी डी किसान' चैनल पर होगा। पहली बार लोगों को साईबाबा के जीवन चरित्र, शिक्षा व उनके जीवन उद्देश्य को उनके जीवन के बचपन, युवा व वृद्धा अवस्था के जरिये दिखाया जा रहा है। इसमें साईबाबा के बचपन का रोल मास्टर आर्यन, युवा का रोल सार्थक कपूर तथा वृद्ध का रोल समर जयसिंह कर रहे है।

     धार्मिक धारावाहिकों के मशहूर लेखक विकास कपूर इस धारवाहिक के निर्माता, लेखक है। इस धारावाहिक के बारे में विकास कपूर कहते है, मैं चाहता था कि साईबाबा का जीवन चरित्र जो बहुत महान है, वह जन जन तक पहुंचे इसलिए आज से ५ साल पहले धारावाहिक को दूरदर्शन में भेजा था और साईबाबा की अनुकम्पा से पिछले साल दूरदर्शन के डिप्टी डायरेक्टर जनरल आलोक अग्रवाल ने व वहाँ लोगो ने हरी झंडी दे दी और अब यह लोगों तक पहुंचने जा रहा है। डीडी की पहुंच शायद संसार में सबसे ज्यादा है। अब सभी तक बाबा की पूरे जीवन कहानी लोगों तक पहुंचेगी। किस तरह एक अनजान बालक अनंतकोटि ब्रह्मांड नायक साईबाबा बना। लोग राम व कृष्ण के पैदा होने से लेकर भगवान व अवतार बनने की कहानी तो जानते है लेकिन साईबाबा के बचपन और युवा की कहानी नहीं जानते है। इसके लिए मेरे द्वारा लिखी साई की आत्मकथा, साई सह चरित्र, अपर्णे की डायरी, साईलीला पत्रिका इत्यादि के अध्यन व रिसर्च के बाद यह लिखा है।

     साईबाबा के युवा अवस्था की भूमिका निभाने वाले युवा व टैलेंटेड प्रतिभाशाली अभिनेता सार्थक कपूर कहते है, यह मेरे लिए काफी चैलेंजिग था, इसके लिए काफी मेहनत करनी पड़ी। मैं साईबाबा को हमेशा संकट की घडी में याद करता हूँ और वे ही हमेशा मेरी मदद करते है। यह काम भी उनकी देन मानता हूँ। मुझे सबसे ज्यादा मेहनत बोलने के तरीके पर करनी पड़ी क्योकि जो हमलोग बोलते है या बोलने का तरीका है व संतों से काफी अलग है।

     धारावाहिक के निर्देशक चंद्रसेन सिंह व विजय सैनी ने बताया कि साईबाबा के पूर्ण जीवन को दिखाना और उस समय को दर्शाना काफी मुश्किल काम था, लेकिन विकास कपूर के लेखन और उनके अनुभव का साथ होने के कारण हम लोगों को लगता है कि साईबाबा के जीवन के उद्देश्य, उनके ज्ञान, जन समस्याओं के समाधान का तरीका लोगों तक हमलोग जरूर कामयाब होंगे।

     दैनिक धारावाहिक, 'अनंतकोटि ब्रह्मांड नायक साईबाबा' के कैमरामैन आर आर प्रिंस, संगीतकार अमर देसाई, एडिटर पप्पू त्रिवेदी इसके लेखक विकास कपूर है और इसमें बैकग्राउंड म्यूजिक प्रकाश नाग है। इसके मुख्य कलाकार गजेंद्र चौहान, यशोधन राणा, समर जयसिंह, सार्थक कपूर, मास्टर आर्यन, महाजन, महेश राज, प्रिया ग्राबे, किशन भान, शीश खान, हेमल धरिया, जावेद शेख, आयुषी सांगले, राजन श्रीवास्तव, मुस्कान सैनी, कीर्ति सुले, किशोरी शाहने, सुनील गुप्ता इत्यादि है।

मैं अपनी शर्तों पर फिल्मों में कोरियोग्राफी करता हूं : पंडित बिरजू महाराज

    बॉलीवुड में चमके लखनऊ के फनकार...जब कभी क्लासिक फिल्मों में कोरियोग्राफी की बात आयेगी तो लखनऊ के पंडित बिरजू महाराज का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाएगा। कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने सत्यजीत रे की लखनऊ की पृष्ठभूमि पर बनी पीरियड व क्लासिक फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी" में दो गीत गाये और कोरियोग्राफी की।

 

  फिल्म 'देवदास" के गीत 'काहे छेड़े मोहे" की कोरियोग्राफी कर खूब प्रशंसा व सम्मान बटोरा। फिल्म 'डेढ़ इश्कियां", 'उमराव जान" व संजय लीला बंसाली की फिल्म 'बाजीराव मस्तानी" के गीत 'मोहे रंग दे लाल" का नृत्य निर्देशन भला कौन भुला पायेगा। 1986 में पद्म विभूषण सम्मान, संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, कालीदास सम्मान, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय व खैरागढ़ विश्वविद्यालय द्वारा डाक्टरेट की मानद उपाधि, सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, एसएनए अवार्ड, संगम कला अवार्ड, 2002 में लता मंगेश्कर पुरस्कार, 2012 में कमल हासन की फिल्म 'विश्वरूपम" में नेशनल फिल्म अवार्ड फार बेस्ट कोरियोग्राफी, 2015 में वाजिद अली शाह अवार्ड, 2016 में फिल्म 'बाजीराव मस्तानी" के गीत मोहे रंग दे लाल की कोरियोग्राफी के लिए फिल्मफेयर अवार्ड ये साबित करते हैं कि उनकी टक्कर का कोई भी कोरियोग्राफर इंडस्ट्री में फिलहाल नहीं है।

     आइये पंडित जी के लखनऊ कनेक्शन के बारे में भी झांकते चलें। ब्रिजमोहन नाथ मिश्रा उर्फ पंडित बिरजू महाराज संगीतज्ञ, गायक, कवि, कम्पोजर, शिक्षक, निर्देशक, कोरियोग्राफर, वक्ता का जन्म 4 फरवरी 1938 को लखनऊ में हुआ। पिता जगन्नाथ महाराज उर्फ अच्छन महाराज व मां श्रीदेई मिश्रा का प्यार व दुलार मिला। परदादाजी महाराजा ठाकुर प्रसाद अवध के अंतिम नवाब के कथक गुरु रहे। दादाजी बिन्दादीन महाराज व उनके भाई महाराज कालका प्रसाद वाजिद अली शाह के दरबार में कथक नृर्तक थे। बिन्दादीन महाराज के सानिध्य में कला की शिक्षा व हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, गायन, कथक, डांस ड्रामा, ठुमरी, दादरा, भजन, गजल आदि में महारत हासिल की। चाचाजी श्री शम्भू महाराज व बैजनाथ मिश्रा उर्फ लच्छूजी महाराज का भी प्यार व आशीर्वाद मिला।

     पिता अच्छन महाराज, चाचा शम्मू महाराज व लच्छू महाराज से कथक की तालीम हासिल की। पिताजी नवाब रामपुर के दरबार में राज्य नृतक थे। बिरजू महाराज कभी लखनऊ व कभी रामपुर अपनी मां के साथ आते-जाते रहते। सात साल के थे तो रामपुर दरबार में नवाब रजा अली के समक्ष पहली बार अपनी कला का प्रदर्शन किया। फिर नौ साल की उम्र में 20 मई 1947 को पिता का देहान्त हो गया। वे काफी कठिन दिन थे। परिवार सहित कानपुर चले गये। वहां उनकी बहन ब्याही थीं। बीच में आठ माह के लिए चाचा लच्छू महाराज के पास बम्बई भी गये। चाचाजी वहां फिल्मों में कोरियोग्राफर थे। फिर कपिला दीदी अपने साथ दिल्ली ले आयीं। चाचा शम्भू महाराज के पास दिल्ली में भारतीय कला केन्द्र से जुड़ गये। तेरह साल की कम उम्र में उन्होंने नयी दिल्ली के संगीत भारती में कथक की शिक्षा देना शुरू किया। फिर भारतीय कला केन्द्र में कथक शिक्षक की भूमिका निभायी। संगीत नाटक अकादमी की एक शाखा कथक केन्द्र का कार्य भार सम्भाला। 1998 में निर्देशक के पद से अवकाश प्राप्त किया। इसी साल कलाश्रम के नाम से अपना स्कूल खोला और लखनऊ कथक घराने की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। आज उनकी पहचान डांस ड्रामा गोवर्धन लीला, माखन चोरी, मालती माधव, कुमार सम्भव व फाग बहार में सर्वविदित है। पत्नी श्रीमती अन्नपूर्णा देवी (स्वर्गीय), दो बेटे दीपक महाराज, जय किशन महाराज व बेटी ममता महाराज सभी कथक के नामचीन डांसर हैं। पौत्र त्रिभुवन महाराज व पौत्री रागिनी महाराज हैं। लगभग सभी देशों में जाकर एक हजार से ज्यादा स्टेज परफार्मेंस, सैकड़ों वर्कशप कीं।

      सवाल जवाब सेशन : फिल्मों में हमेशा कथक को कोठे पर ही क्यों दिखाते हैं? इस सवाल पर पंडित जी बोले, हमारी फिल्मों में जब कभी कोठे पर डांस की सिच्वेशन आती है तो तत्काल कथक को ही प्रिफरेंस दी जाती है। इसका कारण यह है कि जब अंग्रेज भारत आये तो कथक मंदिरों से निकलकर नवाबों और बादशाह के दरबार की जीनत बन गया। वे ही कथक के पोषक और संरक्षक के रूप में आगे आये। हमारे दादा-परदादा ने तो लखनऊ के अंतिम नवाब के न सिर्फ कथक की तालीम दी बल्कि वे उनके दरबार में एक खास मुकाम रखते थे। उन्होंने ही हमारे दादाजी बिन्दादीन महाराज जी को घर भी मुहैया कराया हुआ था। बिन्दादीन की ड्योढ़ी ने आज स्मारक का रूप ले लिया है। कथक को जिन्दा रखने के लिए उच्च कोटि की तवायफों व भांडों को भी यह कला सिखायी जाती थी। हां, तो आपका सवाल था कि फिल्मों में तवायफ के कोठे पर कथक को ही क्यों दिखाया जाता है। इसकी पहली वजह तो यह है कि इसमें विस्तार, अभिनय, भाव, तेजी, ताल, ठुमरी, संगीत और अदा का अद्भुत समावेश है। जो ठुमरी के साथ एक चमत्कारी भाव उत्पन्न करता है। चूंकि उच्च श्रेणी की तवायफों को यह कला बखूबी आती थी और यह परम्परा सी बन गयी और कथक कोठे पर खूब फला-फूला।

      आप कथक के उच्च कोटि के परफार्मर हैं उसके बाद भी चंद फिल्मों में ही आपने कोरियोग्राफी की है, इसका क्या कारण है? मेरे पूछे जाने पर उनका जवाब था, 'मेरी कुछ शर्तें हैं जिनके पालन के बिना मैं कोरियोग्राफी नहीं करता। सबसे पहली बात है ड्रेस। अगर कास्टयूम वर्गल हुआ तो मैं तुरन्त मना कर देता हूं। फिल्म में क्लासिक टच होना भी जरूरी है। गीत के बोल भी शास्त्रीय होने चाहिए। द्विअर्थी बोलों से मैं परहेज करता हूं। नृत्यांगना को भी डांस में निपुण होना चाहिए। ये सारी शर्तें हमारे मित्र संजय लीला भंसाली पूरा करते हैं तो मैंने उनके साथ दो फिल्मों में कोरियोग्राफी की है। ऐसा नहीं है कि हमारे खानदान को फिल्मों से कोई परहेज था। मेरे चाचाजी शम्भू महाराज जी ने कई फिल्मों में कोरियोग्राफी की जिसमें फिल्म 'मुगले आजम" और 'पाकीजा" प्रमुख हैं।

         लखनऊ के कलाकार आपकी तरफ मुंह उठाये देख रहे हैं क्या उनकी मनोकामना पूरी होगी? इस पंडित जी ने कहा, उम्र के अंतिम पड़ाव में हर कोई अपनी मिट्टी की ओर लौटना चाहता है। मेरी भी इच्छा है कि मैं अपना ज्यादा से ज्यादा समय लखनऊ को दूं। यहां पर लखनऊ घराने की कथक परम्परा की नयी पौध तैयार करूं। कुछ ऐसी योजना बना रहा हूं कि मैं तो लखनऊ में रहूं ही साथ ही मेरे कथक निपुण बेटा दीपक भी वहां कार्यशालाओं को आयोजित करे। मेरी इच्छा है मेरे जन्मभूमि लखनऊ या आसपास कोई डेढ़ एकड़ की जमीन सरकार हमें दे तो हम वहां प्रकृति की गोद में जिसमें कुएं, गोशाला हो, झोपड़ी, ओपन एयर स्टेज, गुरु शिष्य परम्परा जैसा आवासीय कलाश्रम बने, जहां रहकर विद्यार्थी कथक की बारिकियों के साथ कला की अन्य विधाओं जैसे चित्रकला, गायन, वादन व अन्य शास्त्रीय नृत्य सीखें। देखिए प्रदेश सरकार मेरी यह इच्छा कब पूरी करती है।

      आज आप जिस मुकाम पर हैं उसका श्रेय आप किसको देना चाहेंगे? इस सवाल पर उनका कहना था कि नि:संदेह अपनी मां को दूंगा। पिता जी के गुजर जाने के बाद हमारे परिवार पर संकट के बादल छा गये। हम लखनऊ से कानपुर चले गये। मैं चार साल लखनऊ कानपुर के बीच रहा। बाद में कपिला दीदी हमें दिल्ली ले गयीं। वहां भी मेरा स्ट्रगल जारी रहा। दो साल तक साइकिल पर चला। फिर तीन और पांच नम्बर की बस से धक्के खाता हुआ आता-जाता। जिन्दगी में बहुत उतार-चढ़ाव देखे।

     # प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव

केपी दादा ने कहा कि डायलाग तो लिख दूंगा लेकिन लखनऊ से बाहर नहीं जाऊंगा

     बॉलीवुड में चमके लखनऊ के फनकार...फिल्म 'स्वदेश" में उनका लिखा एक डायलाग है 'अपने ही पानी में पिघल जाना बर्फ का मुकद्दर होता है।" आैर 'जिन्दगी इतनी खूबसूरत हो कि जिस दिन मौत आये उस दिन हमारे साथ वह भी खूबसूरत हो जाए" इन दिल को छू लेने वाली जिन्दगी की फिलासफी को बयान करने वाली इन लाइनों के रचयिता महान व्यंग्यकार, उपान्यासकार व फिल्मों के सफल स्क्रिप्ट राइटर जनाब के पी सक्सेना जी 31 अक्टूबर 2013 को हम चाहने की आंखों को नम कर हमेशा हमेशा के लिए इस फानी दुनिया को अलविदा कह गये।

 

  आज हम फिल्म संवादों और स्क्रीन लेखक के बारे में बात करेंगे, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, पद्मश्री ने केपी सक्सेना को सम्मानित किया, जिनके लेखन संवादों ने फिल्मों को सुपर हिट बना दिया। कालिका प्रसाद सक्सेना यानी अपने केपी दादा का जन्म 13 अप्रैल 1932 को बरेली में हुआ था। उनके पिताजी मुजफ्फर अली के पिता राजा सैयद साजिद हुसैन अली के दीवान थे। एक बार घोड़े से गिरकर उनकी मौत हो गयी थी। उनका निधन तब हो गया था जब केपी दादा  मात्र 10 वर्ष थे। वे अपने मामा के साथ रहने आ गए। उनकी आरम्भिक शिक्षा बरेली में हुई व हाई स्कूल व इंटरमीडिएट उन्होंने गोरखपुर से किया। उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ आये आैर विश्वविद्यालय से बटनी में एमएससी की डिग्री प्राप्त की।

    काफी समय वो वजीरगंज थाने के पीछे रहते रहे। फिर पाटा नाला के पास आ गये। उन्होंने क्रिश्चियन कलेज में प्रोफेसर बन, तीन वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। उन्होंने बाटनी पर 14 पाठ्य पुस्तकें भी लिखीं। फिर उन्हें रेलवे में सहायक स्टेशन मास्टर नौकरी मिल गई। उनकी पहली पोस्टिंग भी लखनऊ शहर में ही हुई थी। केपी दादा को बचपन से ही लिखने के शौक था उन्होंने उर्दू में लिखना शुरू किया।

     सुप्रसिद्ध लेखक अमृत लाल नागर जी ने उनसे हिंदी लिखने के लिए कहा। हिंदी के समाचार पत्रों की साप्ताहिक पत्रिकाओं और राष्ट्रीय पत्रिकाओं के लिए भी व्यंग्य लिखना शुरू किया। जो लोगों की पहली पसंद बन गये। बाद में उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन और धारावाहिकों के लिए कई नाटक लिखे और लेखन की एक नयी शैली आैर भाषा का आविष्कार किया जिसमें स्थानीय बोली के देशज शब्द लोगों के दिलों में उतरने लगे। हिंदी, अवधी और उर्दू के समिश्रण से तैयार भाषा उनकी पहचान बन गयी।

       1981 में जब उन्होंने लखनऊ दूरदर्शन के लिए धारावाहिक 'बीबी नातियों वाली" लिखा, जिसे सुशील कुमार सिंह ने निर्देशित किया था, इस धारावाहिक को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। बाद में लोगों की पसंद को देखते हुए इसे राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रसारित किया गया, जिसने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। बाद में जापान में भी इसे डब करके दिखाया गया।

     बॉलीवुड के सुपर स्टार व निर्माता आमिर खान अवध की पृष्ठिभूमि पर आशुतोष गवारिकर के निर्देशन में फिल्म 'लगान" की तैयारी कर रहे थे। केपी दादा के धारावाहिक 'बीबी नातियों वाली" की ख्याति से मुतासिर होकर उन्होंने दादा को फोन किया आैर कहा कि मैं आमिर खान बोल रहा हंू आप मेरी फिल्म लगान के डायलाग लिखेंगे? उन्हें लगा कि सुबह सुबह कोई प्रैंक कर रहा है। उन्होंने फोन काट दिया। फिर फोन आया। तब उन्हें विश्वास हुआ कि सच में आमिर खान ही हैं।

      उन्होंने हां तो कर दी पर एक शर्त भी रख दी कि वे लखनऊ में रहकर ही पटकथा व संवाद लिखेंगे। फिल्म सुपर डुपर हिट रही। अब तो आशुतोष गवारिकर के दादा पहली पसंद बन गये। जब उन्हें 'जोधा अकबर" फिल्म के डायलॉग लिखने के लिए आशुतोष ने कहा तो यह उनके उर्दू, अरबी, फारसी, संस्कृत व राजस्थानी भाषा के ज्ञान का इम्तेहान था। उन्होंने एक महीने का समय मांगा। उनका काफी समय रिसर्च में बीता। आशुतोष को जब डायलाग मिले तो उन्होंने कहा कि वंडरफुल। बाद में दादा के न रहने पर उनका संदेश आया,' केपी सर स्क्रिप्ट को खत्म करने के लिए एक महीने तक दिन में 12 से 14 घंटे तक लिखते थे। 'जोधा अकबर" के डायलाग उन्होंने मुझे पढ़कर सुनाए ताकि मैं डायलाग डिलीवरी आैर उच्चारण को समझ सकंू । वे शूटिंग के समय भी रहे ताकि वो देख सकें कि आम आदमी को डायलाग समझ में आ सकेंगे कि नहीं। मैं समझता हूं कि 'मुगले आजम" के बाद यह एक मुश्किल काम था जिसे केपी सर के अलावा आैर कोई नहीं कर सकता था।

     "निर्देशक प्रियदर्शन की फिल्म 'हलचल" (अक्षय खन्ना, करीना कपूर 2004), फिर आशुतोष गवारिकर के निर्देशन में 'स्वदेश" (शाहरुख खान, गायत्री जोशी -2004), 'जोधा अकबर" (रितिक रोशन, ऐश्वर्या राय- 2008) की फिल्मों के संवाद लेखन के बाद वे एक हारर फिल्म की कहानी पटकथा व संवाद लिखने की इच्छा रखते थे। लेकिन वक्त ने मौका नहीं दिया।

     उन्होंने व्यंग्य कालम, नाटक, व्यंग्य रचनाओं का संकलन व फिल्मों में संवाद लेखन के अलावा रेडियो आैर दूरदर्शन के लिए कई नाटक न सिर्फ लिखे बल्कि काम भी किया। वो फिल्मी मैगजीन मायापुरी में साप्ताहिक व्यंग्य पीस लिखते थे लेकिन उन्हें फिल्में देखने का शौक नहीं था। ये उनके लिए वेस्टेज आफ टाइम था।

      1971 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद उन्होंने देश के लिए धन एकत्र करने के लिए नुक्कड़ नाटक लिखा जिसका निर्देशन आकाशवाणी के जयदेव शर्मा कमल ने किया था। यही नहीं शरद जोशी के बाद उनकी चुटीली व्यंग्य रचनाओं को लोग इतना पसंद करने लगे कि उनके व्यंग्य (गद्य) लेखक होने के बावजूद उन्हें कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया जाने लगा। 1995 में उन्होंने मंच से नाता तोड़ लिया। वो कहते थे कि रास्ते तो कभी खत्म नहीं होते हमें अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ आते ही उसे ले लेना चाहिए। हो सकता है कि वो मोड़ आपकी मंजिल तक जाता हो। उन्होंने अपनी नौकरी से वालेंटरी रिटायरमेंट ले लिया। गद्य लेखक होने के बावजूद काव्य मंच पर बहुत समर्थ कवियों से कहीं ज्यादा तालियां बटोरते थे। उनका मंच पर व्यंग्य प्रस्तुतिकरण अंदाज लाजवाब था। उन्होंने 1800 के आसपास व्यंग्य रचनाएं लिखीं। वह कहते थे कि एक पलड़े पर एक पहलवान को खड़ा कर दो आैर दूसरे पर मेरी रचनाएं रख दो, मजाल है जो पलड़ा एक इंच भी उठ जाए। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में वर्ष 2000 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया।

        # प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव

अनुपम खेर की पहली शादी लखनऊ में दोस्तों ने घर के कमरे में करायी थी

      बॉलीवुड में चमके लखनऊ के फनकार....कश्मीरी पंडित हैं आैर उनके पिता श्री पुष्करनाथ खेर एक सरकारी क्लर्क थे। वे 1953 में कश्मीर से शिमला आ गये थे। अनुपम खेर का जन्म 7 मार्च 1955 को शिमला के लेडी रीडिंग अस्पताल में जब हुआ तो वहां की अंग्रेस नर्स ने उनकी मां श्रीमती दुलारी खेर से कहा कि यह बच्चा मुझे दे दीजिए। इस पर पिताजी ने सख्ती से मना कर दिया। उनकी शिक्षा डीएवी कालेज शिमला में हुई। जब वो क्लास नौ में थे तो पहाड़ से गिरकर उनकी जुबान पत्थर से घायल हो गयी। जिसके चलते वो तोतले हो गये। वे 'क" को 'त" बोलने लगे। तभी उनका एक लड़की से एक तरफा इश्क हो गया। जिसका नाम था कविता कपूर। उसकी पहली शर्त थी कि अगर अनुपम उसका सही नाम ले लें तो वह उनसे दोस्ती कर लेंगीं। अनुपम कामयाब नहीं हुए आैर पहली बार उनका दिल टूट गया।

 

    कालेज के जमाने से नाटकों से जुड़े होने के चलते उन्होंने इस फील्ड में कैरियर बनाने की सोची। घर में गरीबी थी। तभी अखबार में एक एड छपा पंजाब यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आफ इंडियन थियेटर का जिसमें सेलेक्शन होने पर दो सौ रूपये स्टाइपेंड व एक साल का कांट्रेक्ट विद डिप्लोमा। उन्होंने पूजा घर में रखे एकसौ आठ रुपये में से सौ रुपये चुराये आैर पहंुच गये चंडीगढ़। घर लौटे तो पुलिस आ गयी थी मां की शिकायत पर कि उनका सौ रुपया चोरी हो गया है। फिर एक दिन पिताजी ने पूछा कि फलां दिन तुम पिकनिक कह कर गये थे आज सही सही बताओ कहां गये थे। सब सच उगल दिया। मां एक जोरदार थप्पड़ लगाया। पिता जी भी आगे बढ़े तो कान पकड़ लिया कि मैं नाटक नहीं करूंगा लेकिन पिताजी ने एक लेटर देते हुए कहा कि चल जा नाटक कर। माता जी ने कहा कि मेरे सौ रुपये? 'अरे उसे दो सौ रुपये महीना मिलेगा। तेरे सौ भी लौटा देगा।" जं चंडीगढ़ में उनकी पहली मुलाकात किरन सिंह ठाकुर (बाद में किरन खेर) से हुई।

     मन में प्यार के अंकुर फूटे लेकिन मन ही में रह गये। उनका आसमान विशाल था। फिर दाखिला राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हो गया। वो अब्राह्म अलकाजी से बेहद मुतासिर थे। बहुत कम लोग जानते होंगे कि अनुपम खेर ने एनएसडी पास आउट करने के बाद 1979 में लखनऊ के भारतेन्दु नाट्य केन्द्र में टीचिंग की है। टीचिंग के दौरान वो अपने एक स्टूडेंट मिराज आलम के साथ रूम व साइकिल शेयर करते थे। जब पहली तन्ख्वाह मिली तो उन्होंने एक लेडीज साइकिल खरीदी। इसी खुशी में रोवर्स हजरतगंज में अपने खास स्टूडेंट्स को आइसक्रीम की दावत दी थी। तब भारतेन्दु नाट्य केन्द्र गोमती नगर में न होकर रविंद्रालय में था। उन दिनों वो उर्मिल कुुमार थपलियाल निर्देशित नाटक 'यहूदी की लड़की" कर रहे थे। दर्पण संस्था के सचिव डा. अनिल रस्तोगी ने पहले ही कह दिया था कि हम पैसा नहीं दे पायेंगे। वो बिना पैसे की नाटक करने को तैयार थे। लेकिन उनकी एक ही शर्त थी कि उन्हें पौने नौ बजे के बाद न रोका जाए क्योंकि उसके बाद उनका ढाबा बंद हो जाएगा। उनकी दिल्ली के एक प्रेमिका उनसे मिलने लखनऊ आतीं।

    फिर आलमबाग में कृष्णा श्रीवास्तव जी के मकान में वो किराये पर रहते थे। यहीं पर उनके कुछ दोस्तों हेमेंन्द्र भाटिया आदि ने उनकी शादी करा दी। फिर वो निराला नगर रहने आ गये। लेकिन कुछ दिनों बाद उन पर एक अमीर हसीना का दिल आ गया। तभी बम्बई से उनका बुलावा आ गया। वो प्रेमिका आैर नाटक को बीच में छोड़कर चले गये। लड़की के घर वालों ने अन्यत्र उसकी शादी कर दी आैर नाटक में यहूदी का मुश्किल रोल डा. अनिल रस्तोगी को करना पड़ा। लखनऊ के उभरते फिल्मकार मुजफ्फर अली से उनकी मित्रता थी। वे उत्तर प्रदेश सुगरकेन सीड डेवलेपमेंट कारपोरेशन की प्रमोशनल फिल्म बना रहे थे, फिल्म का नाम था 'आगमन"। ये बात है 1982 की। फिल्म में सईद जाफरी, सुरेश ओबेराय, दिलीप धवन आदि कलाकार थे। फिल्म का मेन लीड रोल अनुपम जी को ऑफर हुआ। वे फिल्मों में इंट्री का इंतजार ही कर रहे थे।

    फिल्म गन्ना डिपार्टमेेंट की प्रमोशनल फिल्म होने के नाते कोई कमाल न कर सकी। लेकिन इस फिल्म ने अनुपम में आत्म विश्वास जगा दिया। चल पड़े बम्बई। दो साल तक स्ट्रगल करने के बाद फिर उन्हें राजश्री प्रोडक्शन की महेश भट्ट के निर्देशन में बनने वाली फिल्म 'सारांश" मिली। जिसमें वे खुद 28 साल के होने के बावजूद साठ साल के एक रिटायर्ड मराठी मानुष का रोल करना था जिसका बेटा विदेश में मर जाता है आैर उसकी अस्थियां स्वदेश में आनी हैं। इस रोल के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले।... उनकी गाड़ी चल निकली। अब उनके राह में लखनऊ का स्टेशन छूट चुका था।... 

     फिल्मों के आफरों के ढेर लग गये। लेकिन ज्यादातर रोल बूढ़े व्यक्ति के थे। ओल्ड मैन की छाप न लग जाए इस डर से उन्होंने ज्यादातर रोल ठुकरा दिये। उनके खाते में जो फिल्में आयीं आैर जिनसे उनके अभिनय की गहराइयों का पता चलता है उनमें 'जाने भी दो यारों", 'खोसला का घोसला", 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे", 'डर", 'नागिन", 'लुटेरे", 'बेटा", 'शोला और शबनम", 'खेल", 'त्रिनेत्र", 'राम लखन", 'त्रिदेव", 'कर्मा", 'मिसाल", 'कहो ना प्यार है", 'डैडी", 'मैंने गांधी को नहीं मारा", 'ए वेडनेसडे", 'दिल है कि मानता नहीं", 'कुछ कुछ होता है", 'वीर जारा", 'एम एस धोनी", 'लम्हे", 'सूर्यवंश", 'द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर" को रखा जा सकता है। उन्होंने पंजाबी, मलयालम, अंग्रेजी, मराठी व गुजराती व हिन्दी सहित 500 से अधिक फिल्मों मेें कामेडियन, करेक्टर रोल व विलेन की भूमिकाएं निभायींं।

     हिंदी फिल्मों में काम करने के अलावा, उन्होंने कई प्रशंसित अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में भी काम किया है, जैसे गोल्डन ग्लोब कैटेगरी नामिनेटेड-'बेंड इट लाइक बेकहम" (2002)", एंग ली की गोल्डन लायन जीतने वाली 'वासना-सावधानी" (2007), और डेविड ओ रसेल की अस्कर विजेता 'सिल्वर लाइनिंग्स प्लेबुक" (2012)। उन्हें ब्रिटिश टेलीविजन सिटकाम की 'द ब्वाय विद द टाप नॉट" (2018) में उनकी सहायक भूमिका के लिए बाफ्टा नामांकन प्राप्त हुआ। इसके बाद, उन्होंने टीवी शो जैसे 'कुछ ना कहना", 'अनुपम अंकल", 'सावल दस करोड़ का", 'लीड इंडिया", और 'अनुपम खेर शो - कुछ भी हो सकता है" की मेजबानी की। उन्होंने फिल्म 'ओम जय जगदीश" (2002) के साथ निर्देशन में कदम रखा और निर्माता रहे। उन्होंने फिल्म 'मैंने गांधी को नहीं मारा" (2005) का निर्माण और अभिनय किया। उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें कराची अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला।...

    यही नहीं भारत में केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के पद पर कार्य किया। 31 अक्टूबर 2018 को, उन्होंने अमेरिकन टेलीविजन शो 'न्यू एम्स्टर्डम" पर अपने काम का हवाला देते हुए इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट इंडिया (आईएफटीआईआई) के अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे उन्होंने एक साल पहले ही ज्वाइन किया था। लखनऊ के भातेन्दु नाट्य अकाडमी के 1999 से तीन साल के लिए चेयरमैन रहे। फिर 2001 से 2004 के बीच वे नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के निदेशक रहे।

     सिनेमा और कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2004 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। दो राष्ट्रीय पुरस्कार व 8 फिल्मफेयर पुरस्कार विजेता रहे हैं। अनुपम जी ने मध ुमालती से तलाक लेकर आैर उधर किरन खेर अपने पति से तलाक लेकर दोनों ने शादी कर ली।... उनकी पहली शादी से एक बेटा सिकंदर खेर भी फिल्मों से जुड़ा है आैर पिताजी का एक्टिंग स्कूल बम्बई अौर दुबई में देखता है।

      उनका एक नाटक 'कुछ भी हो सकता है" जो काफी कु छ उनके जीवन की घटनाओं पर आधारित है जिसका मंचन दर्पण की गोल्डेन जुबली में 2010 में लखनऊ में होना था। दर्पण संस्था के सचिव डा. अनिकल रस्तोगी बताते हैं कि उनके स्टाफ ने कहा कि उनकी फीस पांच लाख है। बाद में वे लखनऊ में अपना नाटक करने की तमन्ना के चलते एक लाख में तैयार हो गये। पचास हजार एडवांस भेज दिया गया। जब नाटक खत्म हुआ तो बाकी के पचास हजार जब उन्हें पेमेंट किये जा रहे थे तभी एक फोन आया आैर पैसे की कमी बता कर एक नाटक को कैंसिल करना पड़ रहा था। अनुपम खेर जी बोले आप मेरे पचास हजार भूल जाओ आैर उस नाटक को बुला लो।

     # प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव

पूरा होगा यूपी में फ़िल्म इंस्टिट्यूट का सपना

    लखनऊ। फ़िल्म निर्माण और अभिनय में कॅरियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए यह खबर खास है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुत जल्द प्रदेश में एक फ़िल्म इंस्टिट्यूट की स्थापना करने जा रहे हैं। यह इंस्टिट्यूट मुख्यमंत्री के बहुप्रशंसित प्रोजेक्ट 'फ़िल्म सिटी' के भीतर ही 40 एकड़ क्षेत्र में स्थापित होगी। यहां निर्देशन, प्रोडक्शन, कोरियोग्राफी, एडिटिंग, स्क्रीनप्ले लेखन और साउंड रिकॉर्डिंग जैसे फ़िल्म और टीवी निर्माण से जुड़ी विविध विधाओं का प्रशिक्षण तो लिया ही जा सकेगा, अभिनय कला की बारीकियां भी सीखी जा सकेंगी। फ़िल्म सिटी को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का नया ठिकाना बनाने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री ने फ़िल्म इंस्टिट्यूट की स्थापना को युवाओं का सपना साकार होने जैसा बताया है।

     मुख्यमंत्री योगी ने सोमवार को गौतमबुद्ध नगर में प्रस्तावित 'फ़िल्म सिटी' के विकास के संबंध में कार्ययोजना का अवलोकन किया। फ़िल्म सिटी विकास के लिए चयनित विश्वस्तरीय कंसल्टेंट 'सीबीआरई' और यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) के अधिकारियों ने विश्व के विभिन्न देशों में विकसित इंफोटेनमेंट सिटी के गहन अध्ययन की रिपोर्ट प्रस्तुत की। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में फ़िल्म सिटी के विकास के लिए सभी जरूरी संसाधन उपलब्ध हैं। यीडा क्षेत्र में 1000 एकड़ में विकसित होने जा रही इस फ़िल्म सिटी में फ़िल्म, टीवी, ओटीटी निर्माण से जुड़े सभी आयामों का पूरा समावेश होना चाहिए। यही नहीं, वीएफएक्स, एनिमेशन और गेमिंग इंडस्ट्री के सुनहरे भविष्य को देखते हुए यहां इसके विकास की व्यवस्था भी की जाए। थीम आधारित मनोरंजन पार्कों की स्थापना फ़िल्म सिटी को पर्यटन स्थल के रूप में भी लोकप्रियता दिलाएगी।

     सभी संबंधित पक्षों से करें परामर्श :मुख्यमंत्री ने कहा फ़िल्म सिटी के स्वरूप के संबंध में भारत के साथ-साथ विश्व के प्रतिष्ठित फ़िल्म निर्माताओं, निर्देशकों, स्टूडियो, तकनीशियनों से भी परामर्श लिया जाए, ताकि उत्तर प्रदेश की फ़िल्म सिटी के रूप में दुनिया की एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को नया ठिकाना मिल सके। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास हों जिससे वर्ष 2022 तक यहां शूटिंग की प्रक्रिया शुरू हो सके। मुख्यमंत्री ने फ़िल्म सिटी की विविध परियोजनाओं को पीपीपी मोड पर संचालित करने के निर्देश दिए। प्रस्तुतिकरण के दौरान अपर मुख्य सचिव सूचना नवनीत सहगल और सूचना निदेशक शिशिर सहित यीडा और सीबीआरई के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

  अब देखिए धारावाहिक अनंतकोटि ब्रह्मांड नायक साईबाबा      तिरुपति फिल्म्स के बैनर तले बन रहे दैनिक धारावाहिक, अनंतकोटि ब्रह्मांड नायक साईबाब...